Monday, June 27, 2016

upper castes at pampore martyrs own village balk at giving public land for his funeral

‘शहीद को कफन की जमीन नहीं देंगे, क्योंकि ‘नीची’ जाति का था’




कितना बदनसीब है जफ़र दफ़न के लिए
दो गज ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में
बहादुर शाह ज़फर ने आशिक के लिए कहा होगा, इस दौर में आप इसे शहीदों के लिए पढ़ सकते हैं. सुना तो यही था हमने भी कि मुलुक में शहीदों का बड़ा सम्मान है. लेकिन हाय री जाति! जो मरने के बाद भी नहीं जाती.
एक शहीद को उसके अपने गांव में दाह संस्कार के लिए जमीन नहीं दी जा रही थी. क्योंकि वह उस जाति से था, जिसे ‘निचला’ माना जाता है.
मत कहिएगा अब कि जाति आधारित भेदभाव खत्म हो चुका है. मर गया वो आतंकी हमले में. तिरंगे में लिपटी उसकी लाश आएगी. दुनिया कहेगी, शहीद था. वे लोग नाक दबाकर कहेंगे, ‘नाट’ था.
हेड कॉन्स्टेबल वीर सिंह उन 8 CRPF जवानों में थे, जिनकी जान शनिवार को पम्पोर आतंकी हमले में चली गई. यूपी में जिला है फिरोजाबाद. उसके अंदर शिकोहाबाद का नागला केवल गांव. वीर सिंह यहीं के रहने वाले थे.
रविवार को उनका शव गांव लाया जाना था. इससे पहले वहां भारी बवाल हुआ. गांव के ‘ऊंची जाति’ के ओछी सोच वाले लोगों ने उन्हें अंतिम संस्कार के लिए जमीन देने से मना कर दिया.
और ये जमीन उनके बाप की नहीं थी. पब्लिक प्रॉपर्टी थी. फिर भी वे अड़ गए कि अंतिम संस्कार नहीं होने देंगे. क्योंकि वीर सिंह नाट जाति से था.

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